ABHIVYAKTI || भारतीय और पष्चातीय संगीत || CLASSICAL MUSIC || संगीत की उत्पत्ति

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 भारतीय और पाष्चातीय संगीत 

संगीत के जन्म के सम्बन्ध में जितने भी अभिमत प्राप्ति हुए है ,वे प्रायः प्राकृतिक ,धार्मिक ,मनोवैज्ञानिक अभिमत से प्राप्त तथ्य है ,जिनके पूर्णरूप से प्रभाव एवं साक्ष्य उपलब्धि नहीं है। परन्तु उनको ही सांगीतिक उत्पत्ति ला आधार मानकर ही विश्व भर में संगीत ही  सिध्दांतों एवं उसके वर्गीकरण का अध्ययन स्वीकार्य है। 

संगीत की   उत्पत्ति 

संगीत के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानो ने धार्मिक मान्यताओं के आधार पर अपने – अपने विचार व्यक्त  किए है।  कुछ विद्वानो का मन्ना है कि  संगीत की उत्पत्ति वेदों  के निर्माता ब्रम्हा द्वारा  हुई  है। लेकिन उनके विद्वानो द्वारा  संगीत की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भिन्न -भिन्न धारणाएँ  उनके द्वारा  रचित ग्रंथों में मिलती हैं ,इसमें से कुछ  विद्वान धार्मिक आधार पर तथा  कुछ प्राकृतिक व मनोवैज्ञानिक  दृष्टिकोण से संगीत की उत्पत्ति मानते हैं । संगीत अनादि है ,ऐसा भी कहा गया है कि  मनुष्य के साथ – साथ ही संगीत का जन्म भी पृथ्वी पर हुआ। सत्य यही है कि  संगीत सप्त स्वरों से नीलकली लहरें हैं,जो जल की धारा  की तरह सदैव प्रभावित होती रहती है। 

पाश्चात्य विद्वान फ्रायड के अनुसार ,संगीत की उत्पत्ति एक शिशु के समान है ,इसको मनोवैज्ञानिक आधार पर कहा जा सकता है कि  जिस प्रकार बालक अपनी सभी क्रियाएँ ;जैसे – रोना , चिल्लाना , बोलना आदि अपनी आवश्यकतानुसार सीख लेता है , उसकी प्रकार संगीत का प्रादुर्भाव , मानव में मनोवैज्ञानिक आधार पर स्वयं हुआ। 

जेम्स लौग के अनुसार , पहले  मनुष्य  ने चलना  , बोलना ,आदि क्रियाएँ  सीखीं  और तत्पश्चात  उसमे भाव जाग्रत हुए फिर उन भावों की अभिव्यक्ति हेतु संगीत की उतपाई हुइ । 

दामोदर पंडित के अनुसार , ”संगीत के सात स्वर विभिन्न पशु – पक्षीयों की ध्वनि की ही देंन  है ” मोर से षड्ज ,चातक  से ऋषभ ,बकरे  से गांधार ,कौए \कौआ के मध्यम  ,कोयल से पंचम ,मेढक  से धैवत तथा हाथी से निषाद स्वर की उत्पत्ति मनी  गइ  है। 

 संगीत की उत्पत्ति के आधार 

संगीत की उत्पत्ति के निम्नलिखित आधार :-

प्राकृतिक आधार 

संगीत का उद्भव स्थल प्राकृतिक ध्वनियों का अनुकरण है। प्रकृति और संगीत का सीधी सम्बन्ध जोड़ते हुए अनेक विद्वानों ने संगीत को प्रकृति की आत्मा’ कहा है। इस सम्बन्ध में अनेक किवदन्तियाँ प्रचलित हैं कोहकाफ़ नामक पर्वत पर एक पक्षी रहता है , जिसे फ़्रांस में ‘ अतिशजन तथा यूनान में फ़ीनिक्स कहते हैं। इस पक्षी की चोंच में सात छिद्र होते हैं , जिसमे से हवा के प्रभाव से सात प्रकार की ध्वनियाँ निकलती है। 

ये सात ध्वनियाँ ही सात स्वर कहे गए , लेकिन इस तरह का कोई पक्षी है भी या नहीं इस विषय में किसी को कोई जानकारी नहीं है। 

अरब के सुप्रसिद्ध इतिहासकार ओलासिनिज्म ने अपनी पुस्तक विश्व का संगीत में  संगीत का जन्म का बुलबुल नामक चिड़िया से माना है। उस चिड़िया की धवनि से प्रभावित होकर आदि मानव उसकी चहक की नकल करके , वही स्वर निकालकर आनन्दित होते थे। ओलासिनिज्म ने माना है की ईश्वर ने बुलबुल को संगीतवाहक के रूप में भेजा था। 

मतंगकृत वृह्द्देशी में कोहल के नाम से निम्न श्लोक भी उपलब्ध है :-

षड्ज वदति मयूर ऋषभ चटको वदेतु 

अन्जा वदति गांधार कौंच वदति मध्यमा 

पुष्प साधारण काले कोकिल पंचमो वदेतु 

प्रवृटकाले तु संतप्राप्ते धैवत द्रद्रशे वदेतु 

सर्वदा च तथा देवी निषाद वदेत – गजः।  

पशु – पक्षियों की ध्वनि से संगीत के उद्गम का यह सिध्दांत निःसंकोच ही सत्य माना जा सकता है कि आरम्भ में अलग – अलग ध्वनियों को सुनकर उन्ही ध्वनियों को निकालने की प्रेरणा पाई  हो , परन्तु तर्क की दृष्टि से देखा जाए , तो ऐसा भी माना जा सकता है कि मनुष्य द्वारा अपनी अनुभूति के अनुरूप ही कुछ विशेष ध्वनियों का संकलन अपने मन में किया गया है। इस प्रकार अनेक पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वानो ने इस विषय में अपने विचारों को प्रकट किया तथा किसी ने बुलबुल को , किसी ने अतिशजन को तथा किसी ने जलध्वनि को ,किसी ने पशु – पक्षियों को आधार मानकर संगीत की कल्पना की। मनुष्य ने प्रकृति में समाहित ध्वनि एवं गति को समझा और उसे अपनी मस्तिष्क में धारण करके उसी तरह की ध्वनि निकालने का प्रयास किया होगा और इसी ध्वनि एवं गति ने आगे चलकर मानव में संगीत में संगीत के स्वर व लय का संचार किया। 

धार्मिक आधार 

संगीत के जैम के सम्बन्ध  में अनेक विद्वानों ने अपनी – अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विभिन्न विचार व्यक्त किए हैं।  संगीत की उत्पत्ति सर्वप्रथम वेदों के निर्माता ब्रम्हा ने यह कला शिव द्वारा सरस्वती को प्राप्त हुई। सरस्वती से संगीत कला काज्ञान नारद को प्राप्त हुआ। नारद ने स्वर्ग के गंधर्व , किन्नर तथा अप्सराओं को संगीत की शक्षा दी ,वहा से ही भरत , हनुमान आदि ऋषि इस कला में पारंगत होकर भूलोक में संगीत के प्रचारार्थ अवतरित हुए। पंडित अहोबल के अनुसार , ”ब्रम्हा ने भरत को संगीत की शक्षा दी तहा पंडित दामोदर ने भी संगीत का आरम्भ ब्रम्हा की ही माना है।  ”

कुछ विद्वान संगीत का उद्भव ओउम शब्द  से मानते हिअ , यह एकाक्षर ओउम अपने अंदर तीन शक्तियों कको समाहित किए हुए हैं – अ , उ , म ये तीनो ही शक्ति का प्रतीक हैं। ‘अ ‘ शब्द जन्म व उत्पत्ति का प्रतीक है। ‘उ ‘ धारक पालक व रक्षा का प्रतिक एवं ‘ म ‘ शब्द विलय शक्ति का प्रतिक है। अतः ओउम वेदों का बीज मन्त्र है , ऐसी बीज मन्त्र से सृष्टि की उत्पत्ति मानी गई है और ऐसी से नाद की उत्पत्ति हुई है। 

इस प्रकार शब्द और स्वर की उतपत्ति ओउम से ही मानी गई है। मनु का कथन है कि ऋग्वेद , सामवेद व यजुर्वेद में अ , उ , म में तीन अक्षर मिलकर प्रणव बना , श्रुतिस्मृति के अनुसार यह प्रणव ही परमात्मा का और सुन्दर नाम है। 

भारतीय परम्पराओं का पश्चिम में असर

पाश्चात्य संगीत की थ्योरी के जनक का श्रेय यूनानी दार्शनिक अरस्तु को जाता है जो ईसा से 300 वर्ष पूर्व हुये थे। अब पिछले कई वर्षों से पाश्चात्य संगीतज्ञ्य भारतीय संगीत की परम्पराओं में दिलचस्पी ले रहे हैं। 22 श्रुतियों के भारतीय सप्तक को उन्हों नें 24 अणु स्वरों (माईक्रोटोन्स) में बाँटने की कोशिश भी करी है। वास्तव में उन्हों ने अपने 12 सेमीटोन्स को दुगुणा कर दिया है। उस के लिये ऐक नया ‘की-बोर्ड’ (पियानो की तरह का वाद्य) बनाया गया था जिस में ऐक सफेद और ऐक काला परदा (की) जोडा गया था परन्तु वह प्रयोग सफल नहीं हुआ। इस की तुलना में भारत के उच्च कोटि के वादक और गायक 22 श्रुतियों का सक्ष्मता के साथ प्रदर्शन करते हैं। सारंगी भारत का ऐक ऐसा वाद्य है जिस पर सभी माईक्रोटोन्स सुविधा पूर्वक निकाले जा सकते हैं। 

चतु्र्थ से छटी शताब्दी तक गुप्त काल में कलाओं का प्रदर्शन अपने उत्कर्श पर पहुँच चुका था। इस काल में संस्कृत साहित्य सर्वोच्च शिखर पर था और ओपेरानृत्य नाटिकाओं का भारत में विकास हुआ। इसी काल में संगीत की पद्धति का निर्माण भी हुआ। उसी का पुनरालोकन पंडित विष्णुनारायण भातखण्डे ने पुनः आधुनिक काल में किया है जिसे अब हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति कहा जाता है। इस के अतिरिक्त दक्षिण भारत में कर्णाटक संगीत भी प्रचल्लित है। दोना पद्धतियों में समानतायें तथा विषमतायें स्वभाविक हैं।

भारतीय संगीत को जन-जन तक पहुँचाने में सिने जगत के संगीत निर्देशकों का प्रमुख महत्व है जिन में संगीतकार नौशाद का योग्दान महत्वशाली है जिन्हों ने इस में पाश्चात्य विश्ष्टताओं का समावेश सफलता से किया लेकिन भारतीय रूप को स्रवोपरि ही रखा।

ब्रह्मांड में संगीत की ऐसे हुई थी उत्पत्ति

कहा जाता है कि सभ्यता के साथ संगीत भी परिष्‍कृत हो जाता है। संगीत का अस्तित्‍व ब्रह्मांड की शुरूआत से बताया गया है। प्राचीन समय में ऋषि ईश्वर की आराधना आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न करते थे। इसलिए वह ऊं स्वर से साधना करते थे। ऊं स्वर का दीर्घ उच्चारण कर लंबी ध्वनि द्वारा नाद स्थापित किया जाता था। इस उच्चारण को आध्यात्मिक ज्ञान की वृद्धि और संगीत उपासना पर्याय माना गया है।

संगीत एक ऐसा माध्यम है जो आध्यात्मिकता को मानव जीवन में बनाए रखता है। आध्यात्म अगर जीवन में जरूरी है तो संगीत के बिना इसका अस्तित्व नजर नहीं आता।

भारतीय संस्कृति के मूल तत्व में जीवन-मरण बोध, पाप-पुण्य, जन्म-पुनर्जन्म, कर्म-विचार, मुक्ति का मार्ग, दार्शनिकता, आध्यात्मिकता, सौन्दर्योपासना कलात्मक-लालित्य, स्थापत्य, चित्रकला नृत्य तथा काव्य कला में संगीत को विशेष महत्व दिया गया है।

संगीत की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा हुई। ब्रह्मा ने आध्यात्मिक शक्ति द्वारा यह कला देवी सरस्वती को दी। सरस्वती को ‘वीणा पुस्तक धारणी’ कहकर और साहित्य की अधिष्ठात्री माना गया है। इसी आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा सरस्वती ने नारद को संगीत की शिक्षा प्रदान की। नारद ने स्वर्ग के गंधर्व किन्नर तथा अप्सराओं की संगीत शिक्षा दी।

वहां से ही भरत, नारद और हनुमान आदि ऋषियों ने संगीत कला का प्रचार पृथ्वी पर किया। आध्यात्मिक आधार पर एक मत यह भी है कि नारद ने अनेक वर्षों तक योग-साधना की तब शिव ने उन्हें प्रसन्न होकर संगीत कला प्रदान की थी।

आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा ही पार्वती की शयन मुद्रा को देखकर शिव ने उनके अंग-प्रत्यंगों के आधार पर रूद्रवीणा बनाई और अपने पांच मुखों द्वारा पांच रागों की उत्पत्ति की। इसके बाद छठा राग पार्वती के मुख द्वार से उत्पन्न हुआ था।


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