GAT || घरानों के आधार पर रचनाएँ || पेशकार || CLASSICAL MUSIC||Gharano Ki Utpatti

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घरानों के आधार पर रचनाएँभारतीय संगीत एक ऐसा कला है , जिसमे विभिन्न संगीत ने घरानो ने अपनी विभिन्न रचनाओं को अलकृत कर संगीत  को सुखद्ध एवं लयबध्द बनाने का कार्य किया है। इसी प्रकार संगीत प्रचार – प्रसार में संलग्न विश्वविद्यालय , अकादमी एवं संस्थाओं की विशेष भूमिका रही है। 

विभिन्न घरानों में ताल की अपनी विशिष्ट पहचान होता है। जिस प्रकार धरती ,सूरज ,चाँद ,नक्षत्र यह सभी अपनी -अपनी नियम गति या लय में विद्यमान है ठीक इसी प्रकार संगीत में भी एक समान गति होता है ,लय कहा जाता  है जिसमे गायन ,वादन या नृत्य होता है। लय एवं ताल में भानिष्ठ सम्बन्ध होता है। ताल के अभाव में संगीत सार्थक नहीं होता है , ऐसे संगीत को अनिबध्द संगीत कहा जाता है। संगीत में ताल देने के लिए तबले ,मृदग ढोल और मंजीरे आदि का उपयोग किया जाता है। प्राचीन भारतीय संगीत में मृदंग ,घटम इत्यादि का प्रयोग अधिक होता था ,परन्तु वर्तमान हिंदुस्तानी संगीत में तबला सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय है। विभिन्न घरानों के आधार पर संगीत में प्रयुक्त  होने वाला पेशकर , कायदा , रेला ,गाठ टुकड़ा ,परन , तिहाई , चक्रदार तथा लग्गी – लड़ी का विशेष महत्व है। ये संगीत की ऐसी विधाएँ है , जिसके माध्यम से संगीत को सुरीला एवं लयबद्ध बनाया जाता है।  विभिन्न संगीत घरानों  में इनका उपयोग किया जाता है। विशेषकर वादन शैली के क्षेत्र में इन विधाओं को उपयोगी मन जाता है। घरानों के आधार पर प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित है 

पेशकार 

यह शब्द मूलरूप से पेश शब्द से बना है। तबले के संदर्भ में तबला वादन के स्वरूप को प्रस्तुत करना ही पेशकार कहलाता है। पेशकार मूल रूप से सुन्दर बोलो से युक्त कायदा होता है , परन्तु पेशकार की लय डगमगाती  हुई चलती है। मुख्य रूप से दिल्ली और अजराड़ा घराने के तबला वादक स्वतंत्र वादन पेशकार से आरम्भ करते है। पेशकार का तत्प्रय पेश करने से लगाया जाता है। पेश करना अर्थात सभी के समक्ष साधना व कला के विविध अंगों को रचनात्मकता के साथ पेश करने की महत्वपूर्ण कला पेशकार कहलाती है। 

इस रीती द्वारा किसी भी रचना को पेश करने को पेशकार  कहा जाता है| पेशकार के साथ वैसे तो रंजकता, रोचकता व आकर्षण बनाये रखने हेतु विभिन्न लावो को इसके साथ जोड़ लिया जाता है, परन्तु बोलो की जटिलता के कारण पेशकार को मध्यलय में बज्जे जाता है, लेकिन सौन्दर्य वृद्धि हेतु इसके लय के अन्नय टुकड़ो को सम्मिलित कर पेश किया जाता है | 

कुछ विद्वानों का मानना है कि  पेशकार को प्रस्तुत करते समय ताल के अंतिम विभागों में बोलो की चाल में परिवर्तन आ जाता है|  वास्तव में पेशकार टेबल का एक प्रभवि अंग माना जाता है | पेशकार का प्रस्तुतीकरण मन को मुघ्द करने वाला होता है| यह मध्य ले में वदित होता है साथ ही इसकी चाल अत्यंत सुन्दर और डगमगाती हुई चलती है|  वैसे तो पेशकार को सांगत में भी बजाय जाता है, परन्तु स्वतंत्र वादन में यह अत्यंत मत्वपूर्ण माना जाता है | अतः यह एकल वादन की महत्वपूर्ण पेशकश मानी जाती है | इस प्रकार ढके का विकसित रूप पेशकार मानी जाती है | इस प्रक्कर ठेके का विकसित रूप पेशकार कहलाता है। 

कायदा 

किसी नियमित एवं सुनिश्चित बंद बोल समूह की रचना, जिसका मूलतः विस्तार करना संभव है, कायदा कहलाता है। कायदा तबला वादन की विशेष वादन सामग्री है।  अरबी भाषा के “कैद” शब्द से कायदा बना है। 

गत 

कायदे, पेशकार, टुकड़े, परन आदि से भिन्न एक विशेष प्रकार की बंदिश को गाठ कहाँ जाता है जो अधिकतं तिहे रहित होती है और बाज़ के अनुसार कॉमन फरुखाबाद घराने में गतो का अधिक प्रचलन है। 

फर्रुखाबाद जनपद का इतिहास बहुत ही दूरस्थ प्राचीनकाल का है । कांस्य युग के दौरान कई पूर्व ऐतिहासिक हथियार और उपकरण यहां मिले थे। संकिसा और कम्पिल में बड़ी संख्या में पत्थर की मूर्तियां मिलती हैं। फर्रुखाबाद जनपद मूर्तिकला में महान पुरातनता का दावा कर सकता है, इस क्षेत्र में आर्यन बसे हुए थे, जो कुरुस के करीबी मित्र थे। महाभारत युद्ध के अंत तक प्राचीन काल से जिले का पारंपरिक इतिहास पुराणों और महाभारत से प्राप्त होता है।

‘अमावासु’ ने एक राज्य की स्थापना की, जिसके बाद की राजधानी कान्यकुब्ज (कन्नौज) थी। जाहनु एक शक्तिशाली राजा था, क्योंकि गंगा नदी के नाम पर उन्हें जहनुई के दिया गया था। महाभारत काल के दौरान यह क्षेत्र महान प्रतिष्ठा में उदय हुआ। काम्पिल्य, दक्षिण पांचाल की राजधानी थी और द्रौपदी के प्रसिद्ध स्वयंमवर यहीं हुआ था। पूरे क्षेत्र को काम्पिल्य कहा जाता था और जिसका मुख्य शहर कम्पिल हुआ करता था, जो दक्षिण पंचाल की राजधानी थी।

महावीर और बुद्ध के समय में सोलह प्रमुख राज्यों (महा जनपद) की सूची में पांचाल दसवें स्थान के रूप में शामिल था और यह भी कहा जाता है की इसका क्षेत्र, वर्तमान जनपद बरेली , बदायूं और फर्रुखाबाद तक फैला हुआ था । चौथी शताब्दी बी.सी. के मध्य में शायद महापद्म के शासनकाल में, इस क्षेत्र को मगध के नंद साम्राज्य से जोड़ा गया था। अशोक ने संकिसा में में एक अखंड स्तम्भ का निर्माण किया था, जो चीनी यात्री, फा-हिएन एफए-हियान द्वारा देखा गया था। मथुरा और कन्नौज एवं पंचाल्या क्षेत्र में बड़ी संख्या में सिक्के पाए गए और जिसको मित्र शासकों के साथ जुड़ा होना बताया गया है । सिक्कों को आमतौर पर सी.100 बी.सी. एवं सी.200 ए.डी. माना गया है ।

ऐसा कहा जाता है की, कन्नौज दूसरी शताब्दी में एक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण शहर था, जो की भूगोलशास्त्री पतोलमी (सी.140 ए.डी.) के द्वारा भी कंगोरा या कनोजिया नाम से प्रमाणित किया गया है फर्रुखाबाद के वर्तमान जिले ने गुप्त लोगों के स्वर्ण युग का फल साझा किया और इसके शांति और समृद्धि के लिए बहुत योगदान दिया।

घरानो की उत्पत्ति 

 तबले की उत्पत्ति और उसके नामकरण से संबंधित कई मत प्रचलित हैं। एक मत तो ये है कि एक मृदंग वादक जब प्रतियोगिता में हार गए तो गुस्से से मृदंग को पटक दिया. मृदंग दो भागों में टूट गया. जब मृदंग वादक का गुस्सा ठंडा हुआ तो दोनों हिस्सों को साथ रखकर थाप दिया तो बज रहे थे। टूटने के बाद भी बोला।  यहाँ से एक नाम आया तब भी बोला. यहाँ से तबला बना। ये मत प्रचलित जरूर है लेकिन तर्कसंगत मालूम नहीं पड़ता है क्योंकि मृदंग की बनावट ऐसी होती है कि अगर वो टूट जाये तो वो बजाने लायक नहीं होगा। 

एक मत ये है कि आमिर खुसरो ने तबले का निर्माण किया लेकिन इसके भी साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। कुछ लोगों का मानना है कि भारतीय वाद्य पुष्कर से तबले का जन्म हुआ है। एक प्रचलित मत ये है कि मुग़ल सेना के साथ एक नक्कारे जैसा वाद्य चलता था जिसे तबल कहा जाता था। इसी से तबला बना। तबले की उतपत्ति कैसे हुई किसने की इसके बारे में कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है। 

तबले के कुल 6 घराने हैं जिसमें सबसे पुराना घराना दिल्ली है। दिल्ली से ही घरानों की नींव पड़ी। इसके अलावा फर्रुखाबाद, अजरारा, पंजाब, लखनऊ और बनारस तबले के घराने हैं. ख्याल गायन के साथ पखावज की संगत होती थी। ख्याल गायन के साथ पखावज के बोल जमते नहीं थे। 18वीं शताब्दी में आज का जो तबला है वो विकसित हुआ। पहले तबले में ज्यादा चांटी और मसाले (सियाही) का प्रयोग नहीं होता था लेकिन सिद्धार खाँ ढाढ़ी ने मसाले (सियाही) के प्रयोग के साथ कुछ कायदे, पेशकार और टुकड़ों की रचना की। उस्ताद सिद्धार खाँ ढाढ़ी मुहम्मद शाह रंगीला के प्रतिष्ठित संगीतकार थे।  इन्होंने ही दिल्ली घराने की नींव डाली। 

दिल्ली घराना 

दिल्ली पहला और सबसे पुराना घराना है।  दिल्ली घराने के संस्थापक सिद्धार खान ढाढ़ी के तीन बेटे थे। पहले बेटे बुगरा खाँ, दुसरे बेटे माहताब खान और तीसरे बेटे घसीट खाँ थे। सिद्धार खान ढाढ़ी के दूसरे बेटे माहताब खान से तीन बेटे थे -मक्कू खाँ, मौदू खाँ और बख्शू खाँ।   बुगरा खान के दो बेटे थे उस्ताद सिताब खाँ और उस्ताद गुलाब खाँ। उस्ताद सिताब खाँ के भी दो बेटे थे- नजीर अली और बड़े काले खाँ. उस्ताद बड़े काले खाँ के पुत्र थे बोली बख्श. उस्ताद बोली बक्श के पुत्र थे नत्थू खाँ। उस्ताद नत्थू खाँ के शागिर्द थे मुनीर खाँ। 

दिल्ली पर नादिरशाह के हमले से दिल्ली तबाह हुई तो दबिस्ताने दिल्ली के शायर लखनऊ और रामपुर का रुख अख्तियार करने लगे। शायरों के अलावा जो संगीतकार दिल्ली में थे वो भी दिल्ली से बाहर मुख़्तलिफ़ शहरों में गये। बाएं पर हाथ और दाएं पर उँगलियों के रखने का तरीका सभी घरानों का अलग-अलग है। साथ ही बोलो को निकालने की पद्धति भी घरानों की अलग-अलग है. इसी के कारण घरानों की अपनी -अपनी विशेषता है। 

अजराड़ा घराना

अजराड़ा घराने की शुरुआत दो भाइयों- कल्लू खाँ और मीरु खाँ से होती है। ये दोनों उस्ताद सिताब खाँ के शागिर्द थे। ये दोनों तबला सीखने के बाद अजराड़ा (मेरठ) आ गए और तबले के वादन में कुछ तब्दीलियां पैदा कर अजराड़ा घराने की शुरुआत की.इस घराने में उस्ताद क़ुतुब खाँ, उस्ताद तुल्लन खाँ, उस्ताद घीसा खाँ और उस्ताद मुहम्मदी बख्श मशहूर तबलानवाज हुए।  उस्ताद काले खाँ इसी घराने के हैं जो उस्ताद चाँद खाँ के पुत्र और उस्ताद मुहम्मदी बख्श के पौत्र थे। साबिर खाँ इसी घराने के थे जिनकी मृत्यु 2016 में हो गयी। 

लखनऊ घराना 

सिद्धार खाँ ढाढ़ी के बेटे माहताब खाँ के तीन बेटे हुए- मक्कू खाँ, मौदू खाँ और बख्शू खाँ। दिल्ली से तबले का इल्म हासिल करके मौदू खाँ और बख्शू खाँ लखनऊ आ गए और लखनऊ घराने की बुनियाद डाली। पंडित रामसहाय जिन्होंने बनारस घराने की नींव डाली उस्ताद मौदू खाँ के शागिर्द थे। उस्ताद मम्मू खाँ, मुहम्मद खाँ, मुन्ने खाँ, आबिद हुसैन, वाजिद हुसैन, पंडित बीरू मिश्र, पंडित सपन चौधरी लखनऊ घराने के तबलानवाज हैं। 

बनारस घराना 

लखनऊ में 12 वर्ष तक उस्ताद मौदू खाँ से तबला सिखने के बाद पंडित राम सहाय बनारस आए और बनारस घराने की नींव डाली। इन्हीं के शिष्य हुए बैजू महाराज, रामशरण जी, यदुनन्दन जी, प्रताप महाराज।  इन्होंने अपने भाई जानकी सहाय और भतीजे भैरों सहाय को भी तबले की शिक्षा दी। इस घराने के प्रसिद्ध तबला वादकों में पंडित दरगाही मिश्र, कंठे महाराज, बिक्कू जी, पंडित अनोखे लाल मिश्र, पंडित सामता प्रसाद (गुदई महाराज) और पंडित किशन महाराज हुए। 

फर्रुखाबाद घराना 

उस्ताद मौदू खाँ के भाई उस्ताद बख्शू खाँ के शागिर्द थे विलायत अली. विलायत अली खाँ उस्ताद बख्शू खाँ के दामाद भी थे। लखनऊ से तबला सीखने के बाद फर्रुखाबाद चले गए और फर्रुखाबाद घराने की नींव डाली. विलायत अली खाँ के चार पुत्र थे- निसार अली खाँ, अमान अली खाँ, हुसैन अली खाँ और नन्हे खाँ. इन्हीं से आगे ये घराने चला. इस घराने को आगे बढ़ाने में उस्ताद हुसैन अली खाँ का विशेष योगदान है. इनके शागिर्द हुए उस्ताद मुनीर खाँ. इन्हीं उस्ताद मुनीर खाँ के शागिर्द हुए अहमद जान थिरकवा. इस घराने के प्रमुख तबला वादकों में उस्ताद मसीत खाँ, गुलाम हुसैन, करामात खाँ, उस्ताद बन्दे हसन खाँ, पंडित ज्ञान प्रकाश घोष आदि हुए.

पंजाब घराना 

पंजाब घराना स्वतंत्र घराना है. मशहूर पखवाज वादक लाला भगवानदास के शिष्य फकीर बख्श ने पंजाब घराने की नींव डाली. उस्ताद फकीर बख्श के पुत्र थे. इन्हीं से ये घराना आगे बढ़ा। उस्ताद अल्ला रक्खा खाँ इस घराने के मशहूर तबला नवाज हुए। इन्हीं के पुत्र हैं मशहूर तबला नवाज ज़ाकिर हुसैन. उस्ताद अल्ला रक्खा खाँ के शागिर्द हैं आदित्य कल्याणपुर. आज की तारीख में पंजाब घराना और बनारस घराना सबसे मशहूर घराना है। पंजाब का ठेका मशहूर है। उस्ताद करीम बख्श बैरना, उस्ताद उस्ताद अल्ला दित्ता बघारपुरिया, उस्ताद अल्ताफ हुसैन (ताफो खान), उस्ताद तारी खान पाकिस्तान के पंजाब के मशहूर तबलानवाज़ हैं। 

उस्ताद ज़ाकिर हुसैन और अल्ला रक्खा खान

चूँकि जब दिल्ली से तबला सीखकर सिद्धार खान ढाढ़ी के शिष्य देश के मुख्तलिफ़ शहरों में फ़ैल गये तो उन्होंने तबले के बोल, कायदों को बजाने में थोड़ा-थोड़ा बदलाव किया. हालाँकि 6 घराने होने के बावजूद शैली (बाज) दो ही हैं। पूरब बाज और पश्चिमी बाज। 

तबला बजाने की जो पूरबी शैली है वो खुले हांथों की है जबकि पश्चिमी शैली बंद हाथों की शैली है। इसे किनार का बाज कहते हैं क्योंकि इस शैली में किनार का प्रयोग ज्यादा होता है।  इसमें दो उँगलियों का प्रयोग होता है इसीलिए इसे बन्दबाज भी कहते हैं। इस शैली के अंतर्गत दिल्ली और अजराड़ा घराने आते हैं। 

पूरबी शैली में थाप का प्रयोग होता है जिससे आवाज़ में और गूँज पैदा होती है. बेस का इस्तेमाल जिसे बायां कहा जाता है पर खुले हाथों से थपकी ली जाती है। 

पंडित किशन महाराज

इस शैली में उँगलियों के साथ-साथ पंजे का भी इस्तेमाल होता है इसीलिए इसे खुला बाज भी कहते हैं. स्याही का इस्तेमाल ज्यादा होता है।  इसमें पाँचों उँगलियों का प्रयोग होता है। कारण ये कि लखनऊ में नृत्य के साथ पखावज (खुले हाथों का वाद्य है) की संगति होती थी और तबला यहाँ आया तो पखावज का प्रभाव उसपर पड़ा तो वो खुले हाथों से बजाया जाने लगा. इस शैली के अंतर्गत लखनऊ, फर्रुखाबाद और बनारस घराने आते हैं। 


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